Original poems / Ishu D. Garg

दो राहगीर थे

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दो राहगीर थे, चलते रहे उम्र भर, इश्क़ की तलाश में, हर मोड़ पर। समझा देर से कि मोहब्बत भी अधूरी है, जब तक खुद से मुलाक़ात ज़रूरी है। वो सोचते रहे कोई आएगा पूरा करने, मगर खुद की कमी को कौन भरने वाला था? इश्क़ से पहले खुद से प्यार करना था, ये राज़ वक़्त ने देर से बताया था।